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Ramabhar Stupa

 Ramabhar Stupa was built over a portion of the Buddha's ashes on the spot where he was cremated by the ancient Malla people. Kushinagar, Uttar pradesh, India. Kushinara was the capital of Mallas which was one of the sixteen mahajanpads of the 6th century BCE. https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=426178762213005&id=100044626534960

2,300 years old Bairat Buddhist Monastery or Vihara.

 2,300 years old Bairat Buddhist Monastery or Vihara. It was built during the time of Ashoka in the 3rd century BCE, and near it were found two of Ashoka's Minor Rock Edicts, the Bairat and the Calcutta-Bairat Minor Rock Edicts. The vihara is an important marker of the architecture of India. Bairat Vihara is a freestanding Buddhist vihara, a Chaityagriha, located about a mile southwest of the city Bairat, Rajasthan, India, on a hill locally called "Bijak-ki-Pahari" ("Hill of the Inscription"). https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=426888158808732&id=100044626534960

मान्यवर_कांशीराम_साहब से जुड़े कुछ रेल संस्मरणों की चर्चा आज -

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  मान्यवर कांशीराम साहब से जुड़े कुछ रेल संस्मरणों की चर्चा आज - सोबरन सिंह यह साहब की तस्वीर 05 नवम्बर 1985 एक साधारण से कानपुर के गेस्ट हाउस में प्रातः काल #इपंले द्वारा खींचीं गई थी । साहब मगधएक्सप्रेस ट्रेन से वाराणसी में प्रोग्राम करके आये थे और बेहद थके हुए थे ।  मैं भी इस कारण बड़े ही संकोच में धीरे धीरे कैमरा निकाल कर उसमें फ़्लैशगन लगा कर एक फोटो खींचने की तैयारी कर रहा था कि अचानक साहब मुझसे अपने चिरपरिचित व्यंग्यात्मक अंदाज़ में कहते हैं कि तूँ सबेरे सबेरे अखाड़े के पहलवानों की तरह क्या तैयारी कर रहा है ? अरे फ़ोटो खींचनी है तो जल्दी खींच ! मैं थका हुआ  व रात भर का जागा हुआ हूँ , थोड़ा सा आराम करना चाहता हूँ। बहुजन समाज को जानकर आश्चर्यमिश्रित दुःख भी होगा कि उस पूरी रात साहब मगधएक्सप्रेस की जनरल बोगी में जरा सी जगह में बैठकर व जागकर मुग़लसराय से कानपुर तक आये थे कारण ये था कि जिस कंपार्टमेंट में साहब का रिजर्वेशन था उसे मुग़लसराय स्टेशन पर तकनीकी खराबी आ जाने के कारण काट दिया गया था।  चूंकि साहब का प्रोग्राम इटावा और कानपुर होने के कारण साहब ने हर हाल में आना जरूर...

सालबर्डी की प्राचीन बौद्ध संपदा

सालबर्डी में प्राचीन बौद्ध संपदा मौजूद बन सकता है बौद्ध पर्यटन स्थल, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे बैतूल। बैतूल जिले के मुलताई तहसील प्रभातपट्टन जनपद के अंतर्गत ग्राम सालबर्डी में प्राचीन बौद्ध संपदा मौजूद है। इंडियन आर्कियोलॉजी 1979-80 ए रिव्यूय लेेखक देबाला मित्रा, डायरेक्टर जनरल आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया नई दिल्ली 1983 प्रकाशन के जिला अमरावती के अन्वेषण प्रोफेसर अजय मित्र शास्त्री और प्राचीन इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व नागपुर विश्वविद्यालय के डॉ. चंद्रशेखर के अन्नवेषण के अनुसार मध्यप्रदेश और महाराष्ट के सीमाओं पर बसा सालबर्डी गांव में गुफा है जिन्हें हीनयान बौद्धों द्वारा बनाया बाद में महायान बौद्धों द्वाराकब्जा कर लिया। वर्तमान में महानुभाव समुदाय द्वारा कब्जा कर लिया है। सालबर्डी में प्राचीन बौद्ध गुफा है। एक गुफा के गर्भगृह में कमल पे बैठा बुद्धा की कलाकृति है। बुद्ध का चेहरा क्षतिग्रस्त है। सालबर्डी में पद्मपानी एवं वज्रपानी बुद्ध की मूर्ति मौजूद है। सालबडी में और दो बौद्ध गुफा मौजूद है।  जिसमें से एक बौद्ध गुफा पूर्ण विकसित तथा एक बौद्ध गुफा अधूरी है।  आधुनिक महाराष्ट्राचा...

बौद्ध स्तूप, राजपुर शिवपुरी

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  मप्र के शिवपुरी जिले में है सारनाथ के धमेक स्तूप की तरह का प्राचीन स्तूप Ajay Suryawanshi मप्र के शिवपुरी जिला मुख्यालय से 72 किमी दूर खनियाधाना तहसील में 2300 वर्ष से अधिक पुराना प्राचीन बौध्द स्तूप भग्नावस्था में अब भी बुधोन राजापुर गाँव मे खड़ा है ।गाँव के नाम से ही परिलक्षित होता है कि गांव का का भगवान बुद्ध के नाम से अवश्य ही कुछ संबंध है । स्तूप कई दिनों तक अनदेखी और बदहाली का शिकार रहा तथा स्थानीय गांववाले इसे "कुटिया मठ 'के नाम से जानते है ।अब यह पुरातत्व विभाग के अधीन है । रन्नौद से 12 किमी दूर चलकर यहां पहुंचा जा सकता है ।खनियाधाना- ईसागढ़ रोड से सरस्वती गांव होकर अथवा खनियाधाना- रन्नौद मार्ग से धपहेरा गाँव होकर भी यहां पहुंचा जा सकता है । स्तूप की ईंटों,उसकी सरंचना शैली और उसके स्थापत्य को देखकर इसका स्पष्ट अनुमान लगाया जा सकता है कि इसका निर्माण सम्राट अशोक द्वारा ही किया गया होगा ।यह बिल्कुल सारनाथ के धमेक स्तूप की। तरह है । बौद्ध वैभव काल की समाप्ति के बाद कई दिनों तक उपेक्षा ,गुमनानी और बदहाली में पड़े रहने के बावजूद सैकड़ों वर्षों तक मौसम,आँधी-तूफान के थपेड़े झेलक...

भीमा कोरे गांव 'शौर्य दिवस' का संक्षिप्त

  भीमा कोरे गांव 'शौर्य दिवस' का संक्षिप्त  इतिहास(01.0.1818)               धम्म मित्रों 31दिसम्बर 2019 की रात्रि में हम उपासकगण आयु.एडवोकेट आनंद एस.जगदेव,उमेश मोती राम शिंदे (कौडिन्य बौद्ध) जिला धुले (महाराष्ट्र)एवं आयु.एडवोकेट नंद किशोर वर्मा,गोंडा (उ.प्र.)के साथ ऐतिहासिक घटनास्थल को प्रत्यक्ष देखने पहुंचे। महाराष्ट्र प्रदेश शासन की आवागमन, ट्रैफिक पुलिस आदि की बहुत अच्छी व्यवस्था की गयी थी जिससे कई लाख की भीड़ को जरा सी भी असुविधा नहीं हुयी। भीमा कोरे गांव विजय स्तम्भ को देखने और शहीद रणवांकुरों को नमन,वंदन हम लोगों ने एक साथ किया और 01जनवरी2019 को सम्भाजी महाराज  और गणपत  महार पहलवान की समाधि स्थल को देखकर स्थानीय धम्म मित्रों से उसका इतिहास जानने समझने का पावन अवसर मिला।                                    दिनांक 11मार्च 1689 को पेशवाओं ने हमारे लोकप्रिय राजा सम्भाजी महाराज को खत्म कर उनके शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर तुलापुर नदी में फेंक ...

सारु मारु की गुफाओं से प्राप्त अशोक की धम्मलिपि

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  सारु मारु की गुफायें  ग्राम नकटी तलाई  तहसील रहेटी  जिला सीहोर से   प्राप्त  सम्राट  अशोक  की  धम्मलिपि के शिलालेख 𑀲𑀸𑀭𑀼 𑀫𑀸𑀭𑀼 𑀓𑀻 𑀕𑀼𑀨𑀸𑀬𑁂𑀁  𑀕𑁆𑀭𑀸 𑀫 𑀦 𑀓 𑀝𑀻 𑀢 𑀮𑀸 𑀈  𑀢 𑀳 𑀲𑀻 𑀮 𑀭 𑀳𑁂 𑀝𑀻  𑀚𑀺 𑀮𑀸 𑀲𑀻 𑀳𑁄 𑀭 𑀲𑁂   𑀧𑁆𑀭𑀸 𑀧𑁆𑀢  𑀲 𑀫𑁆𑀭𑀸 𑀝  𑀅 𑀰𑁄 𑀓  𑀓𑁂  𑀥𑀫𑁆𑀫𑀮𑀺𑀧𑀺 𑀓𑁂 𑀰𑀺 𑀮𑀸 𑀮𑁂 𑀔 𑀧𑀺  𑀬 𑀤 𑀲𑀺 𑀦𑀸𑀫𑁂 𑀭𑀸𑀚𑀸 𑀓𑀼𑀫𑀸 𑀭 (𑀲) 𑀲𑀁 𑀯 𑀲 𑀫𑀸𑀡𑁂 𑀫 𑀤𑁂𑀲𑁂 (𑀉) 𑀧𑀼 𑀦𑀺 𑀣 𑀯𑀺 𑀳𑀸 𑀭 (𑀬) 𑀢𑀸𑀬𑁂𑁇 𑀪𑀸 𑀕 1 1.  𑀲𑀸 𑀯 𑀡𑀁 𑀯𑀺𑀬𑀼𑀣𑁂 (𑀦 ) 200506 𑀤𑁂𑀯𑀸𑀦𑀁 𑀆 𑀡𑀸 𑀬 𑀢𑀺 𑀅𑀟𑁆𑀠𑀢𑀺𑀬𑀸 2.  𑀦𑀺 𑀯𑀲𑀸𑀦𑀺 𑀬𑀢𑁂 𑀲𑀼𑀫𑀺 𑀉 𑀧 𑀲 𑀓𑁂 𑀦𑁄 𑀘𑀼 𑀩𑀸 (𑀠𑀁) ( 𑀧)𑀓𑀸𑀢𑁂 𑀳𑀼 𑀲𑀁 𑀢𑀺 𑀯𑀸 𑀲𑀁 (𑀯 𑀘𑁆𑀙)𑀭𑀁 𑀲𑀸 3. (𑀥𑀺𑀓𑀁 𑀫𑁂 𑀲𑀁 𑀖 𑀬 𑀬𑀸 ) 𑀬𑁂 𑀳𑀸 𑀠 𑀘𑀼 𑀲𑀼𑀫𑀺 𑀧𑀓𑀦𑁆𑀢𑀸 𑀇𑀫𑀁 𑀘 𑀓𑀸𑀮𑀁 𑀚(𑀫𑁆𑀩𑀼𑀤𑀺𑀧𑁆) 𑀲𑀺 𑀪𑀸 𑀕 2 4.  𑀤𑁂𑀯𑀸 𑀦 𑀫𑀦𑀼𑀲𑁂𑀳𑀺 (𑀫𑀺) 𑀲𑀺𑀪𑀽𑀢𑀸 𑀳...

मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल सारू-मारू

 ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल सारू-मारू  सारू-मारू एक ऐतिहासिक पुरातात्विक महत्व के साथ बुद्धकालीन अवशेषों का एक पिटारा हैं । यहां प्रत्येक वर्ष दिसंबर माह के अंतिम रविवार को बौद्ध महोत्सव का आयोजन किया जाता हैं। सीहोर जिले में बुधनी तहसील के ग्राम - पान गुराड़िया ( पबात पर्वत) के पास स्थित सारु मारू मेला अपने भव्यता को लेकर जाना जाता हैं। यह गुफाएं करीब 50 एकड़ क्षेत्र की पहाड़ियों में फैली हैं। इस पहाड़ी पर करीब 25 से अधिक प्राचीनकालीन स्तूप बने हुए हैं। यह एक शांत ज्वालामुखी के ऊपर बसा हुआ है। आज से करीब 50 हजार साल पहले ज्वालामुखी के फूटने से उसके लावे से इसका निर्माण हुआ है। ज्ञात हो कि शांत ज्वालामुखी करीब 1 लाख साल के अंतराल में फूटते हैं। इसका अर्थ यह है कि अभी इसको फूटने में लगभग 50 हजार साल और बाकी है। मलवा उपजाऊ होने से धीरे-धीरे यह क्षेत्र हरा-भरा होता गया और बस्तियां बसने लगी। इनमें मुख्य रूप से होशंगाबाद, रेहटी, देलाबाड़ी, आंवलीघाट, नसरूल्लागंज आदि आसपास के क्षेत्र आते हैं। यहां ई. पू. छठीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर चंद्रप्रद्योत का साम्राज्य था। जिनके नाम पर इतिहास का...

बुधोन - राजापुर का विशाल स्तूप

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  बुधोन - राजापुर का विशाल स्तूप बौद्ध सभ्यता की खोज में जब गूगल, इतिहास की किताबें फेल हो जाए, तब फेसबुक पर सर्च कीजिए। फेसबुक पर सर्च करते ही बुधोन - राजापुर का विशाल स्तूप सामने आता है। बुधोन - राजापुर मध्यप्रदेश के खनियाधाना तहसील के अंतर्गत शिवपुरी जिले में है। प्रथम तस्वीर बुधोन - राजापुर के स्तूप की है और दूसरी तस्वीर सारनाथ के धमेख स्तूप की है। दोनों स्तूप मेल खाते हैं, इससे हमें बुधोन - राजापुर के स्तूप का काल - निर्धारण में सहायता मिलती है। वो दिन दूर नहीं जब फेसबुक से बौद्ध सभ्यता का इतिहास लिखा जाएगा। कारण कि हर गाँव में, हर गली में चप्पे-चप्पे पर फेसबुक के यूजर्स हैं, जो बौद्ध सभ्यता की कच्ची सामग्री मुहैया कराने में सक्षम हैं। जो भी हो, बुधोन गाँव हमें हर हाल में बुद्ध की याद दिला जाता है। राजेन्द्र प्रसाद सिंह

बुद्ध का भिक्खा - पात्र

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  बुद्ध का भिक्खा - पात्र चित्र एक में बुद्ध का भिक्खा - पात्र है। फिलहाल यह नेशनल म्यूजियम काबुल में है। इसके पहले यह भिक्खा - पात्र कंधार में था। डाॅ. बेले ने 19 वीं सदी में इसे कंधार में देखा था। कंधार से पहले यह भिक्खा - पात्र पुरुषपुर में था। 5 वीं सदी में फाहियान ने इसे पुरुषपुर में देखा था। पुरुषपुर बौद्ध राजा कनिष्क की राजधानी थी। श्रीधर्मपिटकनिदान के चीनी अनुवाद से पता चलता है कि कनिष्क इसे पाटलिपुत्र से पुरुषपुर ले गए थे। पुरुषपुर से पहले यह भिक्खा - पात्र वैशाली में था, जहाँ इतने बड़े भिक्खा - पात्र को वहाँ बुद्ध को समर्पित किया गया था। भिक्खा - पात्र हरे - भूरे ग्रेनाइट पत्थर का है, जिसका व्यास 1.75 मीटर है। यह लगभग 4 मीटर ऊँचा और लगभग 400 किलो भारी है। आप सोच रहे होंगे कि इतना विशाल भिक्खा - पात्र भला बुद्ध कैसे उठाते होंगे। दरअसल यह उन्हें सम्मान में दिया गया था, जैसे आज के नेताओं को टनों भारी माला समर्पित किया जाता है। इतिहासकार पर्शियन में इस पर लिखा देख इसकी प्रामाणिकता को नकारते हैं। फिर मुगलकालीन लिखावट देखकर प्रयाग किले के अशोक स्तंभ को क्यों नहीं नकारते कि यह म...