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The Concept of Rajadharma in the Indian Knowledge System: A Study of Buddhist Political Ethics and Governance

The Concept of Rajadharma in the Indian Knowledge System: A Study of Buddhist Political Ethics and Governance Chapter 1: Introduction Conceptual Framework: Defining Rajadharma within the broader Indian Knowledge System (IKS). The Buddhist Shift: How the Buddhist perspective transitioned from ritualistic kingship to ethical governance. Research Methodology: Use of Historico-Analytical methods and Philological study of Pali texts. Chapter 2: Socio-Political Background of Pre-Buddhist India The Vedic and Brahmanical concept of Danda and Rajadharma. The rise of the Mahajanapadas and the changing nature of authority. The Gana-Sanghas (Republics) as the cradle of Buddhist democratic thought. Chapter 3: The Origin of Kingship in Buddhist Philosophy Analysis of the Aggañña Sutta: The theory of Mahasammata (The Great Elect) as a social contract. The Ethical Mandate: The King as the 'Protector of Dhamma' rather than a divine entity. The Ten Royal Virtues: Detailed study of the Dasa-...

भगवान का अर्थ

 बुद्ध को पालि वांग्मय में "भगवान" कहा गया है, जैसे कि "नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा सम्बुद्धस्स।" अर्थात्- हम उनको नमस्कार करते हैं, जो भगवान हैं, अर्हत हैं, सम्यक सम्बुद्ध हैं। त्रिरत्न वन्दना के अन्तर्गत कहते हैं- "इतिपि सो भगवा अरहं सम्मा सम्बुद्धो विज्जाचरण सम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्म सारथी सत्था देवमुनस्सानं बुद्धो भगवा ति।"  बुद्ध वन्दना में उनके नौ गुणों का व्याख्यान करने के दौरान "भगवा" अर्थात्- "भगवान" दो बार आया है।  बौद्ध धर्म के पवित्र ग्रंथों में "भगवान" का अर्थ इस प्रकार बताया गया है- "भग्ग रागो भग्ग दोसो भग्ग मोहं, इतिपि भगवा" अर्थात्- जिन्होंने राग, द्वेश और मोह इन तीनों को भग्न कर दिया हो वह भगवान है अथवा इसी नाम-रूप की काया में राग, द्वेश और मोह का उच्छेद कर दिया हो, शमन कर दिया हो, ऐसे व्यक्तित्व को "भगवान" कहा जाता है।  बौद्ध धम्म परंपरा में भगवान का अर्थ है ऐसा व्यक्तित्व, जिसने अपना संपूर्ण जीवन मानवता के लिए, नेक (कुशल) कार्यों के लिए, धम्म (धर्म) के लिये, विचारधारा के लि...

दशरथ जातक जातक से ली गयी है रामकथा

 एक जर्मन लेखक V. Fausboll ने 1871 में एक क़िताब लिखी The Dashratha-Jatak "Being The Story Of King Rama" उसमें यह बताया गया कि राजा राम की कहानी बुद्धिज्म की जातक कथा "दशरथ जातक" से ली गयी है। बुद्धिज्म में 500 से अधिक जातक कथाएं हैं। सारा दर्शन वहीं से निकला है। विश्वभर में आम जन मानस को समझाने के उद्देश्य से कुछ कथाओं के शिल्पांकनकिया गया तो कुछ सच्ची कथाओं के स्तूप इत्यादि भी हैं। जैसे दशरथ और श्रमण कुमार की कथा को तो सुना ही होगा? इसे ह्वेनसांग ने अपनी किताब में कुछ ऐसे लिखा कि एकदिन वह घूमते - घूमते गांधार क्षेत्र में पहुँचे। फिर वहां से पुष्कलावती गए। पुष्कलावती के पास एक स्तूप था।  वह स्तूप बोधिसत्व श्रमक की स्मृति में बना था। श्रमक की कथा को ह्वेनसांग ने लिखा है कि बोधिसत्व श्रमक वहां अपने अंधे माता - पिता की सेवा करते थे। एक दिन का वाकया है कि वे अपने अंधे माता-पिता के लिए फल लाने गए थे। तभी एक राजा जो शिकार के लिए निकले थे, श्रमक को अनजाने में बिष - बाण से मार दिए।  श्रमक बोधिसत्व मरे नहीं बल्कि उनका घाव औषधि से ठीक हो गया। माता - पिता की सेवा करनेवाले बोधि...

दीवाली बौद्धों का उत्सव

 भाषा वैज्ञानिक डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह जी लिखते हैं कि "जॉन एस. स्ट्रांग अमेरिका में रिलीजियस स्टडीज के प्रोफेसर हैं। उन्होंने " द लीजेंड एंड कल्ट आफ उपगुप्त " ( प्रिंसटन, 1992 ) नामक किताब लिखी है। इस किताब में उन्होंने " लोकपणत्ती " ( पालि टेक्स्ट ) के आधार पर बताया है कि भारत की दीवाली एक बौद्ध त्योहार है, जिसका आरंभ सम्राट असोक के समय में हुआ था। इस त्योहार को थाईलैंड में " लोई क्रोथोंग " के नाम से जाना जाता है। यही दीवाली चीन, जापान, बर्मा, कंबोडिया आदि बौद्ध देशों में बौद्ध तरीकों से मनाई जाती है। पोस्ट में संलग्न फ़ोटो थाईलैंड दीवाली का ही एक दृश्य है।" अब प्रश्न यह उठता है कि यदि भारतीय मान्यताओं के अनुसार बुद्ध विष्णु का अवतार होते तथा दिवाली भी राम से संबंधित होती तो यह दोनों धारणाएं भी बौद्ध देशों तक सबसे पहले पहुंची होती? आज भारत के बुद्धिस्टो में भी सुगबुगाहट रहती है और वे दीवाली को दीप दानोत्सव के रूप में मनाते रहे हैं लेकिन बौद्ध मान्यताओं को रिसर्च से प्रमाणिक बल मिलता है जबकि हिन्दू मान्यताओं का केवल भावनात्मक बल दिखता है।  दोनो...

अशोक कालीन पाषाण स्तूप की खोज

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  उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के फिरोजपुर ग्राम की कोठी पहाड़ी में मिला उत्तर भारत का पहला अशोक कालीन पाषाण स्तूप   ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व के पुरास्थलों की विलक्षण खोज की कड़ी में भीखमपुर से मिली बुध्द तथा बोधिसत्व की प्रतिमाएँ और पुरातात्विक महत्व का विशाल टीला दौलतपुर की पहाड़ी में  पुरापाषाणिक औजारों तथा चित्रित शैलाश्रयों की खोज से पुरातात्विक अनुसंधान के खुलेंगे नवीन आयाम परिचय - उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले का इतिहास बहुत ही गौरवशाली रहा है। यह जिला प्रागैतिहासिक काल से लेकर वर्तमान तक अनेक सांस्कृतिक क्रियाकलापों का क्षेत्र रहा है। इस जनपद में प्रवाहमान छोटी - बड़ी नदियां सभ्यताओं में फलने - फूलने में अहम रही हैं। चंदौली जिले का पुरातात्विक अन्वेषण सर्वप्रथम 1875-76 ई० में सर् अलेक्जेंडर कनिंघम , 1877-78 ई० में ए०सी०एल० कार्लाइल तथा उसके बाद 1891 ई० में ए० फ़्यूहरर जैसे पुराविदों ने किया । क्षेत्र में हुए पुरातात्त्विक अन्वेषण के फलस्वरूप प्रागैतिहासिक काल से लेकर ऐतिहासिक तक के विभिन्न शैल - चित्रों से युक्त शैलाश्रयों , सूक्ष्मपाषाणिक , ताम्रपाषाणिक तथा...

भारतीय शरणार्थी

 गांवों से शहरों की ओर मजदूरों के पलायन के कारण और RSS की  कुटिल भूमिका।                    भारत में जाति के आधार पर किसी को कम आंकना अथवा बात-बात पर गाली गलौज करना आम बात होती है। यह बात आम तौर पर तब और आम हो जाती है। जब कोई व्यक्ति गरीब एवं मजदूर हो। इस हालात में ये लोग मान एवं सम्मान के लिए गांव के जमीनदारों की गुलामियों से मुक्त होने के लिए  बड़े पैमाने पर शहरों की तरफ पलायन किए हैं। क्योंकि बिना भेदभाव के गांवों की तुलना में शहरों में काफी अच्छी मजदूरी भी मिलती है। और बात-बात  पर इन्हें कोई जाति सूचक शब्दों से गाली गलौज भी नहीं करता है। यही इनके लिए बड़ी खुशी की बात होती है। इस तरह आजादी के 70-75 सालों में  लगभग 20-25 करोड़ लोगों ने गांव से शहरों की ओर पलायन किया है। शहरों में भी इनकी कोई अच्छी हालात नहीं होती है। इनके आसियाने ज्यादातर रोड अथवा गन्दे नालों के किनारे ही पाये जाते है। लेकिन फिर भी ये लोग गांवों की तुलना में काफी अच्छा महसूस करते हैं।            इन मजदूरों को भारती...

Territories "conquered by the Dhamma" according to Major Rock Edict No.13 of Ashoka (260–232 BCE).

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Ashoka stupa, Nepal.

Sphola Buddhist Stupa

 Sphola Buddhist Stupa at Khyber pass valley, kpk, Pakistan.  The 2nd century stupa may have been constructed towards the end of the Kushan Empire or according to some sources soon after third to fifth centuries. It is the most complete Buddhist monument in the Khyber Pass. It is a reminder of the great Kushana Empire and Buddhism nexus which is often depicted in Gandhara artefacts.  Gandhara sculptures were excavated at this very stupa and are now housed in the museum in Peshawar.

Somapura Buddhist university,

 1,200 years old Somapura ancient Buddhist university, Paharpur, Naogao, Bangladesh. It was designated as a UNESCO World Heritage Site in 1985. https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=426124878885060&id=100044626534960

Ramabhar Stupa

 Ramabhar Stupa was built over a portion of the Buddha's ashes on the spot where he was cremated by the ancient Malla people. Kushinagar, Uttar pradesh, India. Kushinara was the capital of Mallas which was one of the sixteen mahajanpads of the 6th century BCE. https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=426178762213005&id=100044626534960

2,300 years old Bairat Buddhist Monastery or Vihara.

 2,300 years old Bairat Buddhist Monastery or Vihara. It was built during the time of Ashoka in the 3rd century BCE, and near it were found two of Ashoka's Minor Rock Edicts, the Bairat and the Calcutta-Bairat Minor Rock Edicts. The vihara is an important marker of the architecture of India. Bairat Vihara is a freestanding Buddhist vihara, a Chaityagriha, located about a mile southwest of the city Bairat, Rajasthan, India, on a hill locally called "Bijak-ki-Pahari" ("Hill of the Inscription"). https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=426888158808732&id=100044626534960

मान्यवर_कांशीराम_साहब से जुड़े कुछ रेल संस्मरणों की चर्चा आज -

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  मान्यवर कांशीराम साहब से जुड़े कुछ रेल संस्मरणों की चर्चा आज - सोबरन सिंह यह साहब की तस्वीर 05 नवम्बर 1985 एक साधारण से कानपुर के गेस्ट हाउस में प्रातः काल #इपंले द्वारा खींचीं गई थी । साहब मगधएक्सप्रेस ट्रेन से वाराणसी में प्रोग्राम करके आये थे और बेहद थके हुए थे ।  मैं भी इस कारण बड़े ही संकोच में धीरे धीरे कैमरा निकाल कर उसमें फ़्लैशगन लगा कर एक फोटो खींचने की तैयारी कर रहा था कि अचानक साहब मुझसे अपने चिरपरिचित व्यंग्यात्मक अंदाज़ में कहते हैं कि तूँ सबेरे सबेरे अखाड़े के पहलवानों की तरह क्या तैयारी कर रहा है ? अरे फ़ोटो खींचनी है तो जल्दी खींच ! मैं थका हुआ  व रात भर का जागा हुआ हूँ , थोड़ा सा आराम करना चाहता हूँ। बहुजन समाज को जानकर आश्चर्यमिश्रित दुःख भी होगा कि उस पूरी रात साहब मगधएक्सप्रेस की जनरल बोगी में जरा सी जगह में बैठकर व जागकर मुग़लसराय से कानपुर तक आये थे कारण ये था कि जिस कंपार्टमेंट में साहब का रिजर्वेशन था उसे मुग़लसराय स्टेशन पर तकनीकी खराबी आ जाने के कारण काट दिया गया था।  चूंकि साहब का प्रोग्राम इटावा और कानपुर होने के कारण साहब ने हर हाल में आना जरूर...

सालबर्डी की प्राचीन बौद्ध संपदा

सालबर्डी में प्राचीन बौद्ध संपदा मौजूद बन सकता है बौद्ध पर्यटन स्थल, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे बैतूल। बैतूल जिले के मुलताई तहसील प्रभातपट्टन जनपद के अंतर्गत ग्राम सालबर्डी में प्राचीन बौद्ध संपदा मौजूद है। इंडियन आर्कियोलॉजी 1979-80 ए रिव्यूय लेेखक देबाला मित्रा, डायरेक्टर जनरल आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया नई दिल्ली 1983 प्रकाशन के जिला अमरावती के अन्वेषण प्रोफेसर अजय मित्र शास्त्री और प्राचीन इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व नागपुर विश्वविद्यालय के डॉ. चंद्रशेखर के अन्नवेषण के अनुसार मध्यप्रदेश और महाराष्ट के सीमाओं पर बसा सालबर्डी गांव में गुफा है जिन्हें हीनयान बौद्धों द्वारा बनाया बाद में महायान बौद्धों द्वाराकब्जा कर लिया। वर्तमान में महानुभाव समुदाय द्वारा कब्जा कर लिया है। सालबर्डी में प्राचीन बौद्ध गुफा है। एक गुफा के गर्भगृह में कमल पे बैठा बुद्धा की कलाकृति है। बुद्ध का चेहरा क्षतिग्रस्त है। सालबर्डी में पद्मपानी एवं वज्रपानी बुद्ध की मूर्ति मौजूद है। सालबडी में और दो बौद्ध गुफा मौजूद है।  जिसमें से एक बौद्ध गुफा पूर्ण विकसित तथा एक बौद्ध गुफा अधूरी है।  आधुनिक महाराष्ट्राचा...

बौद्ध स्तूप, राजपुर शिवपुरी

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  मप्र के शिवपुरी जिले में है सारनाथ के धमेक स्तूप की तरह का प्राचीन स्तूप Ajay Suryawanshi मप्र के शिवपुरी जिला मुख्यालय से 72 किमी दूर खनियाधाना तहसील में 2300 वर्ष से अधिक पुराना प्राचीन बौध्द स्तूप भग्नावस्था में अब भी बुधोन राजापुर गाँव मे खड़ा है ।गाँव के नाम से ही परिलक्षित होता है कि गांव का का भगवान बुद्ध के नाम से अवश्य ही कुछ संबंध है । स्तूप कई दिनों तक अनदेखी और बदहाली का शिकार रहा तथा स्थानीय गांववाले इसे "कुटिया मठ 'के नाम से जानते है ।अब यह पुरातत्व विभाग के अधीन है । रन्नौद से 12 किमी दूर चलकर यहां पहुंचा जा सकता है ।खनियाधाना- ईसागढ़ रोड से सरस्वती गांव होकर अथवा खनियाधाना- रन्नौद मार्ग से धपहेरा गाँव होकर भी यहां पहुंचा जा सकता है । स्तूप की ईंटों,उसकी सरंचना शैली और उसके स्थापत्य को देखकर इसका स्पष्ट अनुमान लगाया जा सकता है कि इसका निर्माण सम्राट अशोक द्वारा ही किया गया होगा ।यह बिल्कुल सारनाथ के धमेक स्तूप की। तरह है । बौद्ध वैभव काल की समाप्ति के बाद कई दिनों तक उपेक्षा ,गुमनानी और बदहाली में पड़े रहने के बावजूद सैकड़ों वर्षों तक मौसम,आँधी-तूफान के थपेड़े झेलक...

भीमा कोरे गांव 'शौर्य दिवस' का संक्षिप्त

  भीमा कोरे गांव 'शौर्य दिवस' का संक्षिप्त  इतिहास(01.0.1818)               धम्म मित्रों 31दिसम्बर 2019 की रात्रि में हम उपासकगण आयु.एडवोकेट आनंद एस.जगदेव,उमेश मोती राम शिंदे (कौडिन्य बौद्ध) जिला धुले (महाराष्ट्र)एवं आयु.एडवोकेट नंद किशोर वर्मा,गोंडा (उ.प्र.)के साथ ऐतिहासिक घटनास्थल को प्रत्यक्ष देखने पहुंचे। महाराष्ट्र प्रदेश शासन की आवागमन, ट्रैफिक पुलिस आदि की बहुत अच्छी व्यवस्था की गयी थी जिससे कई लाख की भीड़ को जरा सी भी असुविधा नहीं हुयी। भीमा कोरे गांव विजय स्तम्भ को देखने और शहीद रणवांकुरों को नमन,वंदन हम लोगों ने एक साथ किया और 01जनवरी2019 को सम्भाजी महाराज  और गणपत  महार पहलवान की समाधि स्थल को देखकर स्थानीय धम्म मित्रों से उसका इतिहास जानने समझने का पावन अवसर मिला।                                    दिनांक 11मार्च 1689 को पेशवाओं ने हमारे लोकप्रिय राजा सम्भाजी महाराज को खत्म कर उनके शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर तुलापुर नदी में फेंक ...

सारु मारु की गुफाओं से प्राप्त अशोक की धम्मलिपि

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  सारु मारु की गुफायें  ग्राम नकटी तलाई  तहसील रहेटी  जिला सीहोर से   प्राप्त  सम्राट  अशोक  की  धम्मलिपि के शिलालेख 𑀲𑀸𑀭𑀼 𑀫𑀸𑀭𑀼 𑀓𑀻 𑀕𑀼𑀨𑀸𑀬𑁂𑀁  𑀕𑁆𑀭𑀸 𑀫 𑀦 𑀓 𑀝𑀻 𑀢 𑀮𑀸 𑀈  𑀢 𑀳 𑀲𑀻 𑀮 𑀭 𑀳𑁂 𑀝𑀻  𑀚𑀺 𑀮𑀸 𑀲𑀻 𑀳𑁄 𑀭 𑀲𑁂   𑀧𑁆𑀭𑀸 𑀧𑁆𑀢  𑀲 𑀫𑁆𑀭𑀸 𑀝  𑀅 𑀰𑁄 𑀓  𑀓𑁂  𑀥𑀫𑁆𑀫𑀮𑀺𑀧𑀺 𑀓𑁂 𑀰𑀺 𑀮𑀸 𑀮𑁂 𑀔 𑀧𑀺  𑀬 𑀤 𑀲𑀺 𑀦𑀸𑀫𑁂 𑀭𑀸𑀚𑀸 𑀓𑀼𑀫𑀸 𑀭 (𑀲) 𑀲𑀁 𑀯 𑀲 𑀫𑀸𑀡𑁂 𑀫 𑀤𑁂𑀲𑁂 (𑀉) 𑀧𑀼 𑀦𑀺 𑀣 𑀯𑀺 𑀳𑀸 𑀭 (𑀬) 𑀢𑀸𑀬𑁂𑁇 𑀪𑀸 𑀕 1 1.  𑀲𑀸 𑀯 𑀡𑀁 𑀯𑀺𑀬𑀼𑀣𑁂 (𑀦 ) 200506 𑀤𑁂𑀯𑀸𑀦𑀁 𑀆 𑀡𑀸 𑀬 𑀢𑀺 𑀅𑀟𑁆𑀠𑀢𑀺𑀬𑀸 2.  𑀦𑀺 𑀯𑀲𑀸𑀦𑀺 𑀬𑀢𑁂 𑀲𑀼𑀫𑀺 𑀉 𑀧 𑀲 𑀓𑁂 𑀦𑁄 𑀘𑀼 𑀩𑀸 (𑀠𑀁) ( 𑀧)𑀓𑀸𑀢𑁂 𑀳𑀼 𑀲𑀁 𑀢𑀺 𑀯𑀸 𑀲𑀁 (𑀯 𑀘𑁆𑀙)𑀭𑀁 𑀲𑀸 3. (𑀥𑀺𑀓𑀁 𑀫𑁂 𑀲𑀁 𑀖 𑀬 𑀬𑀸 ) 𑀬𑁂 𑀳𑀸 𑀠 𑀘𑀼 𑀲𑀼𑀫𑀺 𑀧𑀓𑀦𑁆𑀢𑀸 𑀇𑀫𑀁 𑀘 𑀓𑀸𑀮𑀁 𑀚(𑀫𑁆𑀩𑀼𑀤𑀺𑀧𑁆) 𑀲𑀺 𑀪𑀸 𑀕 2 4.  𑀤𑁂𑀯𑀸 𑀦 𑀫𑀦𑀼𑀲𑁂𑀳𑀺 (𑀫𑀺) 𑀲𑀺𑀪𑀽𑀢𑀸 𑀳...

मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल सारू-मारू

 ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल सारू-मारू  सारू-मारू एक ऐतिहासिक पुरातात्विक महत्व के साथ बुद्धकालीन अवशेषों का एक पिटारा हैं । यहां प्रत्येक वर्ष दिसंबर माह के अंतिम रविवार को बौद्ध महोत्सव का आयोजन किया जाता हैं। सीहोर जिले में बुधनी तहसील के ग्राम - पान गुराड़िया ( पबात पर्वत) के पास स्थित सारु मारू मेला अपने भव्यता को लेकर जाना जाता हैं। यह गुफाएं करीब 50 एकड़ क्षेत्र की पहाड़ियों में फैली हैं। इस पहाड़ी पर करीब 25 से अधिक प्राचीनकालीन स्तूप बने हुए हैं। यह एक शांत ज्वालामुखी के ऊपर बसा हुआ है। आज से करीब 50 हजार साल पहले ज्वालामुखी के फूटने से उसके लावे से इसका निर्माण हुआ है। ज्ञात हो कि शांत ज्वालामुखी करीब 1 लाख साल के अंतराल में फूटते हैं। इसका अर्थ यह है कि अभी इसको फूटने में लगभग 50 हजार साल और बाकी है। मलवा उपजाऊ होने से धीरे-धीरे यह क्षेत्र हरा-भरा होता गया और बस्तियां बसने लगी। इनमें मुख्य रूप से होशंगाबाद, रेहटी, देलाबाड़ी, आंवलीघाट, नसरूल्लागंज आदि आसपास के क्षेत्र आते हैं। यहां ई. पू. छठीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर चंद्रप्रद्योत का साम्राज्य था। जिनके नाम पर इतिहास का...

बुधोन - राजापुर का विशाल स्तूप

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  बुधोन - राजापुर का विशाल स्तूप बौद्ध सभ्यता की खोज में जब गूगल, इतिहास की किताबें फेल हो जाए, तब फेसबुक पर सर्च कीजिए। फेसबुक पर सर्च करते ही बुधोन - राजापुर का विशाल स्तूप सामने आता है। बुधोन - राजापुर मध्यप्रदेश के खनियाधाना तहसील के अंतर्गत शिवपुरी जिले में है। प्रथम तस्वीर बुधोन - राजापुर के स्तूप की है और दूसरी तस्वीर सारनाथ के धमेख स्तूप की है। दोनों स्तूप मेल खाते हैं, इससे हमें बुधोन - राजापुर के स्तूप का काल - निर्धारण में सहायता मिलती है। वो दिन दूर नहीं जब फेसबुक से बौद्ध सभ्यता का इतिहास लिखा जाएगा। कारण कि हर गाँव में, हर गली में चप्पे-चप्पे पर फेसबुक के यूजर्स हैं, जो बौद्ध सभ्यता की कच्ची सामग्री मुहैया कराने में सक्षम हैं। जो भी हो, बुधोन गाँव हमें हर हाल में बुद्ध की याद दिला जाता है। राजेन्द्र प्रसाद सिंह

बुद्ध का भिक्खा - पात्र

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  बुद्ध का भिक्खा - पात्र चित्र एक में बुद्ध का भिक्खा - पात्र है। फिलहाल यह नेशनल म्यूजियम काबुल में है। इसके पहले यह भिक्खा - पात्र कंधार में था। डाॅ. बेले ने 19 वीं सदी में इसे कंधार में देखा था। कंधार से पहले यह भिक्खा - पात्र पुरुषपुर में था। 5 वीं सदी में फाहियान ने इसे पुरुषपुर में देखा था। पुरुषपुर बौद्ध राजा कनिष्क की राजधानी थी। श्रीधर्मपिटकनिदान के चीनी अनुवाद से पता चलता है कि कनिष्क इसे पाटलिपुत्र से पुरुषपुर ले गए थे। पुरुषपुर से पहले यह भिक्खा - पात्र वैशाली में था, जहाँ इतने बड़े भिक्खा - पात्र को वहाँ बुद्ध को समर्पित किया गया था। भिक्खा - पात्र हरे - भूरे ग्रेनाइट पत्थर का है, जिसका व्यास 1.75 मीटर है। यह लगभग 4 मीटर ऊँचा और लगभग 400 किलो भारी है। आप सोच रहे होंगे कि इतना विशाल भिक्खा - पात्र भला बुद्ध कैसे उठाते होंगे। दरअसल यह उन्हें सम्मान में दिया गया था, जैसे आज के नेताओं को टनों भारी माला समर्पित किया जाता है। इतिहासकार पर्शियन में इस पर लिखा देख इसकी प्रामाणिकता को नकारते हैं। फिर मुगलकालीन लिखावट देखकर प्रयाग किले के अशोक स्तंभ को क्यों नहीं नकारते कि यह म...